Note: This post is not to offend any Shiva Devotee, please read the entire blog before making any assumption. Namah Sivaay!
नोट: ये पोस्ट किसी भी शिव भक्त की भावना को आहत करने के लिए नहीं लिखा गया है । अतः किसी प्रकार के नतीजे में पहुंचने से पहले इसे पूरा पढ़ें। नमः शिवाय।
शिव को जानने के लिए लोग अक्सर उनकी मन से पूजा करते हैं और उनकी कई रूपों में पूजा होती है लेकिन सबसे बड़ी बात यही है की शिव का कोई रूप नहीं है। न तो उनका जन्म हुआ है न उनकी मृत्यु। शिव का एक रूप हमेशा आप टीवी के माध्यम से देखते होंगे, जिनके जटाओं में गंगा होती है, भल पर चंद्र और कंठ में एक नाग। एक हाथ में त्रिशूल दूसरे में डमरू। हमेशा एकांत में ध्यानमग्न। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है की शिव का ऐसा कोई स्वरुप है ही नहीं। शिव निराकार है। वेदों में शिव को महायोगी कहा गया है। कर्मयोग को सर्वोपरि मानने वाले शिव की आराधना करते हैं। श्री राम शिव को अपना गुरु मानते थे लेकिन वो जानते थे उनकी आराधना यूँही नहीं होती। शिव को पाने का एक ही तरीका है, वो है ध्यान और त्याग, शिव को कुछ भी प्रिय नहीं है न बेलपत्र, न भस्म, ये सब केवल मनगढंत बातें हैं जो अक्सर किसी आदिकाल के ऋषिओं की कल्पना पर आधारित शिव के गुणगान के लिए लिखी गयी ग्रन्थ शिव महापुराण में मिलेगा। शिव के अवतार की जहाँ तक बात है तो खुद कभी शिव ने अपने रूप में अवतार लिया ही नहीं है। जिन अवतारों में बात होती है वो शिव के पद पर रहते हैं। क्यूंकि शिव वो खुद है जो सत्य है, जो योगी है, जिसके वस में काल है। शिव शब्द में एक शब्द छुपा है शव, शिव एक एक कण में हैं, शिव हर कोई है लेकिन शिव कोई नहीं है। शिव की कल्पना को अपनी कहानी में लिखने की गलती मुनियों ने भी नहीं की है, इसलिए गणेश को गौरी पुत्र कहा जाता है, और कार्तिकेय को दुर्गा पुत्र बोला जाता है। शिव को जैसे दिखाया गया है ग्रंथों में और टीवी के माध्यम से, शिव को वैसा समझने की भूल हम सभी करते हैं। वैदिक काल में शिव को रूद्र कहा जाता था, जिन्हे बाद में शिव कहा जाने लगा और उनको मानने वाले को शैव।
शिव की भक्ति में सबसे बड़ा नाम रावण का आता है, उन्होंने भी शिव को रूद्र रूप में पूजा किया, कभी शिव ने उन्हें दर्शन दिया ही नहीं है। उसने अपनी कुंडलिनी शक्ति को जागृत करके ही शिव के पद को पाया है। परन्तु जब खुद ब्रह्म को इस बात का अहंकार नहीं है की वो ब्रह्म है तो उस पद पर बैठे किसी को कैसे हो सकता है, रावण को पाप से जोड़ना आसान पर है पर उसने भी बहुत तप किया है शिव के पद पर बैठ के श्री राम के बाण से मोक्ष प्राप्ति के लिए क्यूंकि श्री राम ने खुद शिव की आराधना की थी रावण से युद्ध के लिए क्यूंकि शिव के पद पर रहने वाले को शिव ही हरा सकते हैं, ये एक बेहद जटिल विषय है क्यूंकि शिव क्या हैं ये अबतक नहीं समझ आया होगा।
रूद्र ही शिव है, शव ही शिव है, सत्य ही शिव है, ब्रह्म ही शिव है, योग भी शिव है और योगी भी शिव है, शिव का कोई अवतार नहीं, क्यूंकि शिव आपके अंदर है आपको जगाना है। क्यूंकि शिव का कोई रूप ही नहीं। शिव के हाथ में न डमरू है, न उनका विवाह होता है, न उन्हें गंगाजल पसंद है न बेलपत्र। शिव इच्छा से मुक्त है, शिव की कोई इच्छा नहीं, उसे न तो शिवलिंग रूप में पाया जा सकता है न ही मूर्ति रूप में, क्यूंकि जिसका कोई आकार नहीं उसक रूप कैसा। वैसे ये हर भक्त की अपनी कल्पना ही होती है जो उसे शिव का रूप दिखा देती है, वैसे तो शिव हैं ही नहीं। शिव को यज्ञ से नहीं, तप और योग से पाया जा सकता है, शिव को कल्पना से नहीं, शिव को सत्य से पाया जा सकता है।
कुछ लोग कहते हैं काशी (बनारस) में शिव हैं, कुछ लोग कहते हैं कैलाश में। दरअसल ये ऐसे स्थान हैं जहाँ की मनमोहक शांति आपको शिव पद को प्राप्त करने में मदद करती है, तथागत गौतम बुद्ध ने भी अपने प्रथम पाँच अनुयायिओं को काशी क्षेत्र के सारनाथ में ही पहली बार ज्ञान दिया था, क्यूंकि वहां की शांति ने उन्हें आकर्षित किया, उसी तरह शिव को पाने वाले वहीँ आसन लगा कर बैठ योग में खो जाते थे और शिव पद पाते थे।
काशी के अस्सी घाट में ही बैठ कर गोस्वामी श्री तुलसीदास ने श्री रामचरितमानस की रचना कर दी और उसमे जो शिव का वर्णन है उससे सटीक वर्णन आज तक किसी भी ग्रन्थ में नहीं है और उसे "रुद्राष्टकम" कहा जाता है। रुद्राष्टकम से आप शिव की वंदना नहीं, उसका वर्णन समझते हैं, जो की वैसे संभव तो नहीं है परन्तु एक बेहद सफल कोशिश है ये समझने की शिव ईश्वर नहीं हैं। शिव आप खुद हैं, शिव आपके मुख से निकला सत्य वचन है, शिव शांति है, शिव योग है, शिव तप है और इनसब (तप,सत्य,मन,योग और शांति) का कोई आकार नहीं है। शिव एक पत्थर नहीं, उसे शिव समझने की कोशिश न करें। आईये "रुद्राष्टकम" के कुछ पंक्तियाँ देखें और एक बार सोचे जिनका जन्म ही नहीं हुआ उनका रूप आप कैसे देख सकते हैं।
"नमामीशमीशान निर्वाणरूपं
विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥"
अर्थात: जो निर्वाण में हैं या निर्वाण रूप में हैं,जो निराकार है, जो ॐ के मूल हैं, जो महाकाल हैं यानि की काल जिनके वस में है, जो संपूर्ण ब्रह्माण्ड में हैं, जो गुण और अवगुण से परे हैं, और वेदों में हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं है, जो निष्पक्ष है, मैं उनकी उपासना करता हूँ।
अब यदि एक और देखें..
"प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं
अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं
भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥"
जो प्रचंड है, साहसी है, श्रेष्ठ है, अखंड है, जो अजन्मा है, जिसका तेज हज़ार सूर्यों जैसा है, जिसका मूल नहीं है परन्तु किसी भी मूल का नाश कर सकता है, जिसके हाथ में त्रिशूल है (यहाँ तुलसीदास जी सगुन ब्रह्म की कल्पना कर रहे हैं) और जो माँ भवानी (जिनका मूल भव है, यानि की "होना" या इसे आप प्रकृति भी कह सकते हैं, उन्हें आदरपूर्वक यहाँ माँ कहा गया है ) के पति हैं (ये उनकी कल्पना है), उन्हें हम आदर भाव से प्रणाम करते हैं।
इन दो श्लोकों की पंक्तियों में आप देख सकते हैं की कैसे अलग अलग विचारों को प्रस्तुत कर रहे हैं, उसमे कुछ काल्पनिक और कुछ सच हैं, इसी रह पर अन्य ग्रंथों की रचना हुई है।
अतः ये अपने आप में दिलचस्प है की आपके अपने विचार और कल्पना आपको कैसे आगे ले जाते हैं। पहले भी थे, आज भी हैं और आगे भी शिव केवल कल्पना और कहानियों में मिलने वाले एक पात्र बने रहेंगे। शिव कौन है और क्या हैं, हर इंसान इस पहेली को अपने तरीके से समझता
और हल करता है।
न जानामि योगं जपं नैव पूजां
नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।

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